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सागर की...

सागर की लहरें जब धीमे-धीमे किनारों को छू जाती है। तब ऐसा लगता है मानों,वो उन पर अपना प्यार लुटाती है। जब वे ही अपने रौद्र रूप में आयें। तो किनारों को भी खुद में समा ले जायें। जब शांत हो तो,सागर अपने अंदर का व्यर्थ किनारों पर छोड़ जाए। जब क्रोध इतना दर्द दे जाए। फिर क्यों न बस,प्रीत से ही रहा जायें।

By Sushila devi
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