Sushila devi
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सागर की लहरें जब धीमे-धीमे किनारों को छू जाती है। तब ऐसा लगता है मानों,वो उन पर अपना प्यार लुटाती है। जब वे ही अपने रौद्र रूप में आयें। तो किनारों को भी खुद में समा ले जायें। जब शांत हो तो,सागर अपने अंदर का व्यर्थ किनारों पर छोड़ जाए। जब क्रोध इतना दर्द दे जाए। फिर क्यों न बस,प्रीत से ही रहा जायें।

आओं,आज गणपति बप्पा की छवि दिल में बसायें। जो हर संकट के विघ्नहर्ता जग में कहलायें। मोदक का भोग लगाकर,श्रद्धा-सुमन अर्पण कर जायें। इनकी मेहर भरी नजर से,कार्य सम्पूर्णता को पायें।

आओं,आज गणपति बप्पा की छवि दिल में बसायें। जो हर संकट के विघ्नहर्ता जग में कहलायें। मोदक का भोग लगाकर,श्रद्धा-सुमन अर्पण कर जायें। इनकी मेहर भरी नजर से,कार्य सम्पूर्णता को पायें।

शब्द ही हमारा, व्यक्तित्व निखार लाए। शब्द ही हमें,बुलंदियों के आसमाँ तक पहुँचाये।। सदैव सार्थक शब्द को ही,इस चंचल जुबां पर बिठाए रखना। फिर कोहिनूर हीरों जैसे दोस्तों को,दिलों में बसाए रखना।।

मुझें तुमसे कोई दवा नही,सिर्फ दुआ चाहिए। उड़ने के लिए इन परों को,जमीं नही आसमाँ चाहिए। मुझें छूने है बस,आसमाँ के चाँद-सितारे। बशर्ते तुम रहना ताउम्र,मित्र मेहरबाँ हमारे।

क्यूँ चेहरे पर चेहरा लगाए,बैठे है लोग। न जाने क्यूँ असली चेहरे को छुपाए,ऐंठे है लोग। ज़ुबान पर खंजर,होठों पर मुस्कान है नकली। हे!मालिक,क्यूँ सब जगह मिलावट,कहाँ छुप गया असली।

क्यूँ चेहरे पर चेहरा लगाए,बैठे है लोग। न जाने क्यूँ असली चेहरे को छुपाए,ऐंठे है लोग। ज़ुबान पर खंजर,होठों पर मुस्कान है नकली। हे!मालिक,क्यूँ सब जगह मिलावट,कहाँ छुप गया असली।

ए दिल! कभी मायूस न होना,जमाने के रीत से। जिंदगी के हर पल को, सजाना प्रीत से। फिर हर शह तेरे लिए, मुस्कान लाएगी। हर खुशी भी तेरे पास, दौड़ी आ जायेगी।

ए मुस्कान! सब तेरे लिए ही,बाहें फैलायें बैठे हैं। तेरे ही मिलन का, संसार सजाये बैठे हैं। न कभी ज्यादा देर न लगाना,तू कभी आने में। तेरी झूठ के चर्चे मशहूर हो जायेगें,इस जमाने में।


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