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मसाफ़े- जिस्त की...
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मसाफ़े-...
“
मसाफ़े- जिस्त की उदास अंगड़ाइयाँ। दर्द की लिखती हैं हर शाम रूबाइयाँ।। रंज़ो-ओ -गम् में ज़ब्त हो जब दिल। तिनके का सहारा भी लगता है,खुदा की रहनुमाइयाँ मंजुला पांडेय 'मंजुल"
”
By
Manjula Pandey
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Manjula Pandey
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