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क्यूँ तुझी...

क्यूँ तुझी को देखना चाहती है मेरी आँखें क्यूँ ख़ामोशीयां करती बस है तेरी बातें क्यूँ इतना चाहने लगा हूँ तुझको मैं की तारे गिनते हुये कटती है मेरी रातें आपको भूल जाये वो नज़र कहाँ से लाएँ किसी और को चाह ले वो जिगर कहाँ से लाएँ नहीं रह सकते आपके बिना उफ़ भी ना निकले… वो ज़हर कहाँ से लाएँ

By RAHUL NEGI
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