STORYMIRROR

किताब,...

“ किताब, डायरी और वस्त्र सब बेज़ुबान से हैं, ये सूने कमरे के सन्नाटे भी हैरान से हैं। मंज़िलें छूट गईं, सफ़र भी ख़त्म हुआ अब, हम अपने चरम शून्यकाल के ढलते मुकाम से हैं। ”

By प्रेमयाद कुमार नवीन
 6


More hindi quote from प्रेमयाद कुमार नवीन
0 Likes   0 Comments
0 Likes   0 Comments
0 Likes   0 Comments
0 Likes   0 Comments
0 Likes   0 Comments