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कि अगर...
कि अगर ये पहाड़...
कि अगर ये...
“
कि अगर ये पहाड़ नहीं होते,
तो मैं, मैं नहीं होता,
मैंने देखा कोई ख़्वाब नहीं होता,
मन के अंदर इस तूफ़ान से कभी लड़ा नहीं होता,
सुकून की तलाश में इतना कभी खोया नहीं होता,
मैं कभी ख़ुद से ख़ुद को मिला नहीं होता,
अगर ये पहाड़ नहीं होते तो मैं मैं नहीं होता।
©akshitsaxena
”
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