“
जनसंख्या की वृद्धि का, शहर झेलते दंश।
नाममात्र ही रह गया, प्राणवायु का अंश।
प्राणवायु का अंश, सिलसिला हर दिन जारी
गाँव शहर की ओर, बढ़ रहे बारी बारी।
पनपें यदि ग्रामीण, रहे ना दुविधा बाकी।
शहरों से हो दूर, वृद्धि यह जनसंख्या की।
-कल्पना रामानी, नवी मुंबई
”