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जन्नत नुमा...

“ जन्नत नुमा ज़िंदगी दोजख सी हो गई गम में डूबी रोज़ इक सी हो गई चाह तो बस चार दिन की चांदनी की थी पर न सांसे बची और उम्मीद भी खो गई। ”

By Shubham Utkarsh
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