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आहिस्ता...

आहिस्ता आहिस्ता चल रही थी ज़िंदगी कि उसके आने से वक़्त ही थम गया है. अहसास का नज़्म कुछ इस तरह से चल रहा है, जैसे- रूह तक वो बस गया है.

By Saumya Jyotsna
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