मैं विजय हूं लोग पाना चाहते हैं, मुझको पाकर खिलखिलाना चाहते हैं।
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कब तक छल से तुम सारा संसार खरीदोगे, कब तक बल से तुम अपना अधिकार जमाओगे, कमजोरों के सीने पर पग रख कर बढ़े तो क्या, आखिर इस दुनियां में तुम कातिल कहलाओगे।।
मही ओढ़ कर धानी चूनर , यौवन मन को हर्षाए, आलिंगन करने को आतुर , ऋतुराज मिलने आए, रंग बिरंगे परिधानों में , धरा सजी दुल्हन जैसी, पुरवाई मदहोश करे औ, बागों में कोयल गाए।। ©® कुमार@ विशु