लफ़्ज़ों में कैसे बताऊँ उस दर्द की गहराई... जहाँ किसी की याद में एक मजबूत इंसान भी घुटनों पर बैठकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोता है। इश्क का वो पागलपन इंसान को ज़िंदा तो रखता है, पर उसकी हर सांस मौत से भी ज्यादा भारी हो जाती है।"
लफ़्ज़ों में कैसे बताऊँ उस दर्द की गहराई... जहाँ किसी की याद में एक मजबूत इंसान भी घुटनों पर बैठकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोता है। इश्क का वो पागलपन इंसान को ज़िंदा तो रखता है, पर उसकी हर सांस मौत से भी ज्यादा भारी हो जाती है।"
लफ़्ज़ों में कैसे बताऊँ उस दर्द की गहराई... जहाँ किसी की याद में एक मजबूत इंसान भी घुटनों पर बैठकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोता है। इश्क का वो पागलपन इंसान को ज़िंदा तो रखता है, पर उसकी हर सांस मौत से भी ज्यादा भारी हो जाती है।"
लफ़्ज़ों में कैसे बताऊँ उस दर्द की गहराई... जहाँ किसी की याद में एक मजबूत इंसान भी घुटनों पर बैठकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोता है। इश्क का वो पागलपन इंसान को ज़िंदा तो रखता है, पर उसकी हर सांस मौत से भी ज्यादा भारी हो जाती है।"
लफ़्ज़ों में कैसे बताऊँ उस दर्द की गहराई... जहाँ किसी की याद में एक मजबूत इंसान भी घुटनों पर बैठकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोता है। इश्क का वो पागलपन इंसान को ज़िंदा तो रखता है, पर उसकी हर सांस मौत से भी ज्यादा भारी हो जाती है।"
लफ़्ज़ों में कैसे बताऊँ उस दर्द की गहराई... जहाँ किसी की याद में एक मजबूत इंसान भी घुटनों पर बैठकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोता है। इश्क का वो पागलपन इंसान को ज़िंदा तो रखता है, पर उसकी हर सांस मौत से भी ज्यादा भारी हो जाती है।"
सुखविंदर की कलम से: "खाली जेब और अस्पताल के चक्कर अक्सर सच्चे रिश्तों की औकात बता देते हैं। जब आपकी औलाद तड़प रही हो और अपने ही दरवाजे बंद कर लें, तो समझ लेना वो रिश्ते उसी दिन श्मशान की राख बन गए। याद रखना, जो तुम्हारे आंसुओं में तुम्हारे साथ खड़े नहीं हो सकते, उन्हें अपनी कामयाबी की छाँव में कभी मत बैठने देना। क्योंकि जो बुरे वक्त में बेगाने हो गए, वो अच्छे वक्त में भी सिर्फ आपके रुतबे के सगे होत
सोचा था आज अपनी डायरी में दुनिया की कोई नई कहानी लिखूंगा, पर मेरे ख्यालों की पूरी कायनात तो बस तुम ही हो... नतीजा ये हुआ कि मेरी ही कलम ने मुझसे बगावत कर दी, और हर एक पन्ना सिर्फ तुम्हारी मुस्कान और तुम्हारे नखरों के नाम कर दिया!