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नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष
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तुझको जाना, तुझको चाहा, तू ही तो इक यार मेरा नहीं यथार्थ हो सका,हो ऐसा, भावों का संसार मेरा प्रेम किया मैंने तुमसे, मैं करता ये इनकार नहीं आदि -अंत “उत्कर्ष” प्रेम, इक ये ही तो आधार मेरा - नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष

कान्हा का हूँ दास प्रिये, जिह्वा पर राधे नाम रहे मेरे प्रति कोई क्या सोचे, मुझको ना इससे काम रहे प्रेम के पूरक हैं दोनों, दोनों ने प्रेम सिखाया है प्रेम अमिट अभिलाषा है जो, मेरी आठो याम रहे - नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष

ज्ञान न माने जाति को, सन्त न जाने स्वाद | मूरख को अनकूल सब, रखो 'नवीना' याद ||

भोले-भालों का नहीं, इस जग में आधार टेढ़ों से सीधा चले, यह टेढ़ा संसार

जीव के कर्म पर जीव का अवतरण जीव ऊपर चढ़ा माटी का आवरण कर्म ऐसे करो मनुष्य देह ही मिले सद्गुणों क करो, मिलके अब अनुशरण नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष


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