हक़ीक़त के ख़ारे पानी में घुली-सी मैं, परहेज़ है मुझे ज़रा, चाशनी में डूबे किरदारों से! -Simpy Aggarwal (Palam, New Delhi)
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हर अपूर्णता में पूर्णता है वो, हर तंगी में भी दाता है वो, वो नारी ही अन्नपूर्णा है, साक्षात् पृथ्वी पर विधाता है वो! ©सिम्पी अग्रवाल
मानसिकताओं की परिधि को पार करे जो, एक ऐसी हवा चाहिए, इलाज करे जो क्षीण सोच का, एक ऐसी दवा चाहिए! बदलते वक़्त के दौर में, बदलाव लाना ही बदला लेना है, जो पेड़ हवा के रुख़ के साथ नहीं झुकता... अक्सर हुए टूटते हुए देखा है मैंने! परिवर्तन ही वो हवा है, यही वो दवा है, माना हर बदलाव विकास नहीं, पर विकास की एकमात्र यही दुआ है! ©सिम्पी अग्रवाल
लोभ और मोह में बस इतना सा फर्क़ है, लोभ सब कुछ पाने की इच्छा रखता है, और मोह सब कुछ खो कर भी नहीं छूट पाता... पर एक सफल ज़िन्दगी के लिए, दोनों का ही त्याग ज़रूरी हैं! ©सिम्पी अग्रवाल
रिश्तों को अनमोल बनाना पड़ता है, अपनी ज़िन्दगी का भी मोल लगाकर, वरना कीमत तो इंसान अब, हवा की भी लगा ही रहा है! ©Simpy Aggarwal
मान सुरक्षित स्वाभिमान सुरक्षित, हो सुरक्षित सुरक्षा के अधिकार, हर दर्पण दिखाता केवल चित्र, सुरक्षित रहे चरित्र भी सदा, संस्कारों पर न कोई करे प्रहार! ©सिम्पी अग्रवाल
क्षीण सोच न पाये नोच, बंधन न लें मन को दबोच, सामजिक कुरीतियों का नाश हो, खुले गगन में हर साँस हो, न बने किसी चीज़ के आदी, असल में तब होगी आज़ादी! © Simpy Aggarwal
नन्हे-नन्हे मोती जब मिलते, बन जाता है हार, रिश्तों की डोरी से बंधकर, बनता है परिवार, दिल से दिल की बंधती डोर, दिल के जब खुलते द्वार, हर मुश्किल होती आसान, जब साथ खड़ा परिवार! -सिम्पी अग्रवाल
ख़ुद के सारे काम छोड़, वो किसकी लड़ाई लड़ रहा है, मुस्कुरा रहा है कोने में बैठा साँप, आज इंसान ही इंसान को डस रहा है! ©Simpy Aggarwal