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Renu Sahu

Romance


4.5  

Renu Sahu

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तुम कब आओगे...

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आज सुबह सुबह उन्होंने फोन किया, बहुत फुर्ती, चंचलता और अपनापन सब कुछ था l सबसे ज्यादा कुछ था तो वो था प्यार, जो रोज की दौड़ भाग की जिंदगी मे कहीं खो सा गया था, ऎसा लगा मानो वो वापस आ गया था l शादी को दूसरा साल पूरा होने वाला था, लेकिन खुद को सही तरीके से खड़ा करने की होड़ मे तनु का पति शायद प्यार करना भूल गया था, और तनु उस प्यार की खोज मे वयस्कता ही खो डाली थी l 

बात दो ही साल पुरानी है कॉलेज की पढ़ाई साथ करते ना जाने कब दो सहपाठी गहरे मित्र बन गए और फिर ये गाढ़ी दोस्ती प्यार के सांचे मे कैसे ढाली ये शायद वो भी ना समझ पाए l यू तो ये जोड़ी बिल्कुल परफेक्ट थी, जहां रिया चुलबुली, थोड़ी मासूम, दिल से बच्ची लेकिन समझदार थी, तो वहीं रोहन सयाना गम्भीर, पूरी तरह से प्रैक्टिकल और खूब केअर करने वाला था l एक दूसरे में शायद कुछ तो कमी रही होगी, लेकिन दोनों का साथ किसी को कोई कमी खोजने का अवसर ही नहीं देता था l बस यही कारण था दोनों अपने घर वालों को मना पाए अपनी शादी के लिए l 

शादी से पहले कॉलेज खत्म होते तक रोहन घर से काफी दूर मल्टीनैशनल कंपनी मे नौकरी करने लगा l और तनु कुछ महीनों की स्ट्रगल के बाद घर के पास नौकरी ढूंढ ही ली l 

दो साल मे कंपनी के साथ का अनुबंध पूरा कर रोहन घर लौटने वाला था, इसलिए नवविवाहित पत्नी की नौकरी बरकरार रखते हुए उसे घर ही छोड़ कर खुद अपने जॉब मे चला गया l सब कुछ कितना अच्छा था, दूर होकर भी एक दूजे के एहसास को समझने लगे थे l अनकहे ही दिल का प्यार बरबस ही एक दूसरे पे उड़ेल देते थे l चाहे जितने व्यस्त थे रात का थोड़ा सा समय और सुबह की पहली आवाज दोनों के लिए बहुत खास थी l लेकिन इस खुशी को जिम्मेदारी और कैरियर में आगे बढ़ने की कसक ने धर दबोचा l 

रोहन पे बढ़ते काम के बोझ ने उसके वक्त को बस ऑफिस तक समेट दिया, घर आना तो छुटा ही रिया के लिए वक्त भी कम होने लगा, और तभी सरकार ने लोगों के अन्य राज्य आवागमन मे भी रोक लगा दी l और एक खूबसूरत रिश्ता जो बस खिल के मुस्करा ही पाया था फूल बनने से पहले मुरझाने लगा l इधर तनु की भी हिम्मत और सब्र ने ज़वाब दे दिया, पूरा दिन तो सबसे ठीक से रहती लेकिन रात को उस एक प्यार भरी आवाज की इंतजार उसकी नींद उड़ाने लगी l बाते तो होती लेकिन एक नीरसता के साथ जिसमें सिर्फ समस्याओ का निवारण किया जाता l लेकिन अंतर्मन के व्यस्थित हालात का किसी के पास समाधान ना था l अब शायद तनु की भी उम्मीदें बढ़ रही थी तो रोहन खुद में ही खोने लगा था l दोनों अध पके से अपनी जिंदगी की गाड़ी साथ होके भी अकेले चला रहे थे l 

इस पर जब सुबह रोहन ने उसी पुराने अंदाज मे जब आज तनु से बात की, सच मानो ऎसा लगा मानो भगवान ने उन्हें पूरी खुशियां ही दे दी हो l मानो चातक को सावन की बूंद मिल गई हो l लेकिन रोहन का सावन अब भी दूर था क्युकी उसकी तनु विरह की आग मे झुलसती खुद के अस्तित्व को भूलती हुई, रोहन को समझ नहीं पा रही थीं l 

और दोनों ही एक राग अलाप रहे थे "तुम कब आओगे".........! 


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