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Hilal Saeed

Romance


5.0  

Hilal Saeed

Romance


तनहाई

तनहाई

2 mins 398 2 mins 398

तनहाई से इस कदर आशना हो चुके हैं हम के अब ख़ामोशी से नज़रो को झुकाना सीख लिया है की अब ये सारी मुस्कुराहटें सच्ची हैं, मुख़तसर सी हैं की अब हक नहीं किसी ओर का इन पर।

हालात के सबब कबूल करनी पडी हैं कुछ ऐसी बाते देखे हैं कई बेनाम से चेहरे के अब मिलना नहीं है किसी से।

जितने आँसु दिए थे किसी ने, वो सब खुदा की बारगाह मे छोड़ आया हूं हर सजदे मे आसूँ अपने देकर उसको भुलाया हे मेने उन सजदो को न जाने केसे निभाया हे मेने के छोड़ आया हूं उस मोहबबत को खुदा के उस पाक धर मे, के ज़रूरत नहीं मुझे अब उसकी।

मुस्कुराहटों से वास्ता इस कदर गहरा हो चला हे के मन भी अब बदल रहा है, मंजिल भी बदल गयी के रास्ता जो चुना हे मेने खुदसे मिलने का।

अब खुद से इस कदर रूबरू हुए हैं की फिर किसी से रूबरू होने की ख्वाहिश नहीं, के अब तसव्वुर मे भी नहीं आता कोई शख्स। 

मोहब्बत से दामन इस तरह छुडाया गया हे की अब तलब नहीं इशक़ से रूबरू होने की, किसी की ज़ुल्फों की कैद में रहना, किसी की आखों में इशक़ बनके उतर जाना ऐसे अब ख्वाब हम देखा नहीं करते।

अब रातों से दोस्ती हे की निभाना जो सीख लिया हे, टूटते तारे को देखना, रातों में खुद सेे गुफतगु ऐसे करना के मुस्कराते हुए पलको पर अशकों का छलक जाना।

कुछ खवाहीशे, कुछ खवाब जो देखे थे कभी उनके मुकम्मल होकर भी ना मुकम्मल रह जाने का एहसास होने पर नम आँखों से मुस्करा देता हूं, कुछ इस तरह भी उसको भुला देता हूं।


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