“
ये इश्क है या जिस्म का खेल
ये इश्क आज अपनी पहचान भूल कर
सिर्फ जिस्म का मोहताज बन चुका है ।
हर कोई आज सिर्फ रूप रंग को भाता है
छिप गई है आज अंद्रुरूनी खुबसूरती आज प्यार सिर्फ दैहिक तो होता है|
झूट फरेब आज हर कन्ही बसा है
ना जाने सच्चा प्रेम कहां छुप सा गया है ।
”