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वक़्त की...
“
वक़्त की कलम पकड़े कोइ हिसाब लिखती रही मेरे इश्के की महक हवा में मिलती रही, यह आखरी टुकड़ा है ऊँगलीयों में से छोड़ दो, उतार दो पन्नों पर की धुंधली सी लगे बातें, फकत, बस इसी बात पर कलम मुझसे लड़ती रही ।।
”
By
PRIYA DAGAR Res. Scholar, School of Biochem. Engg. IIT (BHU)
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PRIYA DAGAR Res. Scholar, School of Biochem. Engg. IIT (BHU)
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