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तुम्हे...

“ तुम्हे एहसास भी ना होगा मेरी उलझनों का ,मेरे अनकहे सवालों का मेरे ऊपर टूटने वाले पहाड़ों का घुट -घुट कर बीतने वाले लम्हों का बेहिसाब तेज होती धड़कनों का लगा सको अगर अंदाजा इनका तो बताओ क्या कर सकते हो मेरे लिए विपत्तियों को मेरे कम कर सकते हो जर्ज़र किस्मत को मेरी सिल सकते हो क्या मेरी जख्मों को मरहम कर सकते हो क्या फ़िर... छोड़ दो मेरे हाल पर मुझे आहिस्ता -आहिस्ता संभल जाऊँगी,ठोकरों से अपने सँवर जाऊ ”

By MANISHA JHA
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