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तलब-ए-आ...
तलब-ए-आराम गुनाह...
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तलब-ए-आराम...
“
तलब-ए-आराम गुनाह है मान लो वक्त कल था,आज भी है जान लो मिलता सब जहाँ में कभी न कभी पर मिले कैसे ये राहें पहचान लो।
”
By
Pratik Prabhakar
31
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Pratik Prabhakar
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