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तेरी गलियों...

“ तेरी गलियों से जब भी गुज़रता हूँ मैं, खुद को संभालूँ कैसे, बिखरता हूँ मैं। जो कसमें खाई थीं, जो वादे किए थे, क्यों तोड़ दिए तूने जो साथ जिए थे। ”

By प्रेमयाद कुमार नवीन
 


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