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सोचता हूंँ...

सोचता हूंँ खुद खुदा ने ऐसा क्या अनमोल बनाया होगा, तब मांँ का दूजा रूप उन्हें समझ में आया होगा मां तुम बस्ती हो ना, हर घर हर आंगन में, मांँ तुम रहती हो ना, गइया बछिया और छाजन में

By राजेश "बनारसी बाबू"
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