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रोज भागती...
“
रोज भागती जिंदगी थम गई हो जैसे सुनसान गलियां हलचल के लिए तक रहीं हों फिर से सन्नाटों का शोर बढ़ गया है इस कदर कानों के पर्दे ही कहीं फट न जाएं इससे।
”
By
Kavita Sharrma
314
सुनसान
गलियां
सन्नाटा
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Kavita Sharrma
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