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पत्थर अपने...
“
पत्थर अपने पास उठाई ,मेरे पास गज़ल। दिन भर वो कस्ति है फब्तियां ,काम न आया शगल। यादों के अंबार मैं रोता ,समझ ना आई ये भंवर, कान में वो पर्दा कर बैठी ,मैं सुनाता रहा गज़ल।
”
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राजेश "बनारसी बाबू"
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