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जब मर्जे जिस्म...
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जब मर्जे...
“
जब मर्जे जिस्म को दवा की दरकार थी ; तब कोई तबीब ना मिला । जब जिंदा रहने की कोई उम्मीद न रही ; तब कोई रकीब ना मिला। नादान
”
By
Rahim Khan
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