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ज़हर...
ज़हर घोलकर पानी...
ज़हर घोलकर...
“
ज़हर घोलकर पानी में
ना जाने क्यूं
गंगा जल की तमन्ना रखते हैं ,
कभी जड़ कटने के बाद भी
क्या पेड़ जमीं पर टिकते हैं ।
”
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