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हर रोज़ इक शाम...
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हर रोज़ इक...
“
हर रोज़ इक शाम गुज़र रही है, उस रोज़ की इक शाम के इन्तज़ार में, जब कोई एतबार देकर गया था, तुम ज़रा अब्स़ार रखना देहलीज़ पे -2 हम आयेंगे और फिर, इक रोज़ की शाम हमारे नाम होगी । *जया के जज़्बात
”
By
Jaya Bhardwaj
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Jaya Bhardwaj
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