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डर मगर...

डर मगर रुशवाइयो का रोने देता हैं कहां अपने ही घर में भी बेटियां महफूज रहती है कहां बलात्कार चीख वेदना दर्द सब सहती है यहां बेबसी का मंजर याद कर रातों को तकिया भोगोती है यहां कली को मुरझाते देख कर भी दरिंदो को इन बेटियो पे तरस आती है कहां

By राजेश "बनारसी बाबू"
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