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बयाँ करूँ...

बयाँ करूँ भी तो क्या करूँ ना वो अल्फाज समझते हैं ना ही जज़्बात समझते हैं रहते हैं हम एक ऐसे समाज में जहाँ लोग इश्क़ को भी अपराध समझते हैं....

By seshabanta Bishi
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