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आज़ तक उस...

“ आज़ तक उस मोड़ पर मिलते निशां जो इश्क़ के दो दिल ज़हां पर मिल रहें थें और पौधें पेड़ पत्ते भी गवां है जिस जगह हम तुम जुदा फिर हो गएं थें... अनिकेत सागर ”

By कवी अनिकेत मशिदकर
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