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आज फिर आई...
“
आज फिर आई हैं किरणें आँगन में उतरकर, पूस के प्रकोप में भी। उतरती हैं ठिठुर कर , जाड़े की शाल ओढकर। @सुजाता
”
By
Sujata Kale
54
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