“
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ*
का नारा चलता है हर साल।
बेटी पढ़ी पर बेटी बची नहीं ये सवाल उठता है हर साल।
फिर भी सवाल नहीं उठा।
किसी सत्ता के सौदागर पे ना उठी उंगली।
इन मां के राज दुलारों पे ना उठा सवाल।
इन रखवालों पे सवाल उठा तो सिर्फ उस बेटी पे,
जो कर रही थी सेवा,
मरीज़ों की रात के अंधेरे में,
तो कभी दिन के उजालों में...बेटी
”