Indu Kothari
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श्याम अब्र गगन पर छाये विरहन के मन को तड़पाये सांझ सकारे तेरा पंथ निहारे नयन नीर झरे दिल भी हारे इंदु कोठारी ✍️

कर गुंजित वह कुंज गली उपजा मधुकर हिय अनुराग हुआ सुवासित सारा उपवन बिखरा परिमल झरा पराग इंदु कोठारी ✍️

नसीर बना कर पंछी को क्यों निज भाषा सिखा रहे मानव हो मानव ही बने रहो क्यों यह दानवता दिखा रहे इंदु कोठारी ✍️

उदयाचल पर देख भानु को हर्षाया व्योम धरा मुस्कराई हो सर्वत्र समता विश्वबंधुत्व दिखे मानव मन की परसाई इंदु कोठारी ✍️

चांद से गोरे मुखड़े पर बिखरी भीगी अलकें अलसुबह उनींदे लोचन मसि रेखित थी वे पलकें इंदु कोठारी ✍️

भयभीत जीव जगत में हरपल ढूंढ रहा है माया अंतर्मन कलुषित भया बाहर फकत दिखावा

खुशियों भरा हो आलम सारा पग पग पर हरियाली आशा के सुमनों से निर्मित हो जीवन की हर डाली इंदु कोठारी ✍️

गगन घिरी घनघोर घटा श्वेत श्याम है जलद अटा मोर पपीहा खुश हो नाचे देख के सुंदर नीरद छटा इंदु कोठारी ✍️


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