poet
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खफा हो...?? या रंज ए गम में खोये हुए हो। लगता है, मुंह मोडे़ हुए हो। कोई चूक हुई ? क्या मुझसे, माफ़ भी करो...!! क्यों नाराज़गी का चादर, ओढ़े हुए हो।
बेबुनियादी, शक लिए, क्यों घुमते हो साहब , हरेक मर्ज का ईलाज है, पर शक का नहीं। वो तो एहसान है कुछ आपका, इसलिए ग़म खा रहा हूं मैं। लगता है,आपको? कि फायदा उठा रहा हूं मैं। - गौतम गोविन्द