मैं कवि, लेखक और विचारक हूँ। मैं अपनी रचनाओं के लिए कई प्रतियोगिताओं में पुरस्कार जीत चुका हूँ। मेरी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। मेरी रचना साझा संकलन "शब्द दीप" में सम्मिलित है, जिसने "इंडिया बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स" में अपना स्थान बनाया है।
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आजकल कुछ लोगों को रहता एक ही काम, इसकी बातें उस से करना, लेकर हमारा नाम। दूसरों की बुराई हम से करते, बनकर हमारे, फिर उनके सामने जताते, वे हैं उनके प्यारे।
निशीथ में जन्मे जब कान्हा, किसी को पता नहीं चला, अपने चमत्कारों से पूरे जगत का करते रहते ये भला। गुप्त रूप से करते लीलाएं और सबको करते अचम्भित, गीता- ज्ञान अर्जुन को दिया, सभी हुए इससे शिक्षित।
आओ सभी देशवासी स्वतंत्रता का उत्सव मनायें, अपने अपने स्थान पर भारत का तिरंगा फहरायें। कठोर संघर्ष के बाद ही ये घड़ियाँ लाने दी गई हैं, आने वाली पीढ़ियों को खुशियाँ मनाने दी गई हैं।
मेरे भारत की मिट्टी का तिलक माथे पर लगाकर, हमारे सैनिक, खिलाड़ी एवं किसान पाते हैं शक्ति। इस शुभता के प्रतीक से हर भय को दूर भगाकर, ये मानते हैं जैसे इन्होंने कर ली है ईश्वर की भक्ति।
प्रत्येक नागरिक को जलाये रखना चाहिए आज़ादी का दीप, किसी दूसरे की ग़ुलामी को आने नहीं देना चाहिए अपने समीप। अवश्य ही सबकी भावनाओं और विचारों का सम्मान करना चाहिए, परन्तु हमारी अपनी मान्यताओं की सुगंध को कभी नहीं मरना चाहिए।
जहाँ है स्वतंत्र सोच, सशक्त्त राष्ट्र तो वही है, यह बात सभी विद्वानों व महापुरुषों ने कही है। किसी के निर्देशों का ही अनुसरण ठीक नहीं, जहाँ उचित लगे, अपने विचारों को रखना वहीं।
तुम मेरे दिल से खेलकर चले गए और इससे निकली आह, मग़र तुम अपने खेल से खुश होकर बोलते हो वाह जी वाह। शर्म आती है कि मैंने कभी तुम्हें अपना सब कुछ माना था, तुम्हें तो मेरे दिल को टूटे खिलौने की तरह भूल ही जाना था।
उसे मालूम था मुझे उससे बेशुमार प्यार था, फिर भी उसने मेरे कलेजे पर किया वार था। सब मालूम होकर भी वह बेवफ़ाई कर गई, या शायद प्यार के पथरीले रास्तों से डर गई।