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Dhan Pati Singh Kushwaha
Literary General
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TEACHER IN DIRECTORATE OF EDUCATION, NATIONAL CAPITAL TERRITORY OF DELHI

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पितृपक्ष में प्रभु और पितरों से हम, मॉंगते हैं अशीष करते हुए उन्हें याद। उनके आदर्श और संस्कार सदा ही, अक्षुण्ण हों परलोक गमन के भी बाद। @ गायत्री धन पति सिंह कुशवाहा @

निज संसाधनों का नियोजित ढंग से, विवेकपूर्ण सकारात्मक हो उपयोग। अगर लालच स्वार्थ त्याग सकें तो, मिटेंगे तृष्णा संग सकल ही भव रोग। @ गायत्री धन पति सिंह कुशवाहा @

अनुपम उपहार अनुपम अद्वितीय जीवन यह अपना, प्रभु का है अमूल्य अतुलित उपहार। स्वस्थ तन-मन संग दायित्व निर्वहन, निखारते रहें निज आचरण व्यवहार। @ गायत्री धन पति सिंह कुशवाहा @

कल है अनिश्चित  करने वाले के पास हजार काम हैं, न करने वाले को कई हजार बहाने। अनवरत रहें रत शुभ कार्यों में हम, अनिश्चित कल,हो न हो,न कोई जाने।

समस्या और समाधान* तिक्त और मधुर स्मृतियॉं होतीं सबके पास, हम रहें प्रफुल्लित ही स्मृत कर मधुरिम पल। तिक्तता से होती है निराशा जो रखेगी उदास, केवल हमारे पास है हमारी समस्या का हल। @ गायत्री धन पति सिंह कुशवाहा @

जग में हम सबके आने का, है निश्चित उद्देश्यपूर्ण कारण। न विचलित हों समस्याओं से, नियत समय पर होगा निवारण। @ डी पी सिंह कुशवाहा @

निज मन में हमें सदा रहे हर पल ही अहसास, इस जग में आगमन का कुछ उद्देश्य है खास। स्वार्थ त्याग परहित में रहें अनवरत ही रत हम, अडिग रह सत्पथ पर अथक करते रहें प्रयास। @ गायत्री डी पी सिंह कुशवाहा @

आनंद का आधार है हमारी आत्मतुष्टि, संतुष्टि बिन आनंद न देगी संपूर्ण सृष्टि। सत्पथ पर दृढ़ रहें शुभता संजोए दिल में, भरोसा प्रभु पर दृढ़ सुनिश्चित कृपा की वृष्टि। @ गायत्री डी पी सिंह कुशवाहा @

लक्ष्य प्राप्ति में यदि है लम्बा इंतजार, संभावित परिणाम भी होगा असरदार। नहीं हों हम अधीर होकर के बेकरार, सीखें परिस्थितियों को करना स्वीकार। @ गायत्री डी पी सिंह कुशवाहा @


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