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ऐ दोस्त तू जिंदगी कर ले, कुछ इस तरह से बसर घुट-घुटकर ऐसे ही जीने की, खुद को ना दें सजा यादगार बन जाए ये जीवन, पल-पल कि क्षणों में तू ले-ले जीने का मजा मरके फिर कभी ना होगा, इसी शरीर में तेरी आत्मा का मिलन जुदा होंगे ये एक दूजे से, कहीं ना होगा इसका नामो-निशा अनमोल इस देह को व्यथीत नाकर, तू दुख और पीडाओ से उस राह को चुन लें जहां मिल जाए, तुझे जीने कि एक नई दिशा " सुनीता चावडा"
बहुत खुशी देना भी उसका रास ना आया, अब क्या नाम दे हम उसको, जिसे हमने सब कुछ माना, खबर नहीं हमें क्या कमी थी, हमारी वफा मैं, हमने भी तो दिल उसपे लुटाया, मगर सिला कुछ और ही नजर आया..।