भीतर बहुत कुछ टूटता रहा.... वो ओढ़ के बैठी रही ...मुस्कुराहटें ।।
Share with friends
शाख से गिरते पत्ते और उम्र से फिसलते बरस... लौटते नहीं... पर छोड़ जाते है , अपनी स्मृति , नयी कोंपलों के रूप में...। जो जगह तो भरते है,पर अनुभव की सलवटें नहीं...!!