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Vaidehi Singh
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I am a student of electronics and communication engineering. I am here to showcase my poems. Whoever visits my profile will go satisfied. Hope you will like it.

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Submitted on 09 Jun, 2021 at 07:28 AM

दिलबर के दीदार को तरसती हैं निगाहें, और जुदाई में तो चाँद की ठंडक से भी निकलती हैं जलन की आहें। फिर चकोर की चाहत परवान चढ़ी है, ज़रा देखो आज चाँद की रोशनी बढ़ी है। गौर किया जब चाँद की खूबसूरती पर, तब याद आया, कि ऐसा ही तो दिखता है मेरा दिलबर।

Submitted on 05 Mar, 2021 at 15:26 PM

खोट तो देखने वालों की नजरों में है, जिन्हें हम हंसते हुए अच्छे नहीं लगते हैं। दिल्लगी सीखनी है तो दुश्मनों से सीखो, जिन्हें हम रोते हुए भी अच्छे लगते हैं।


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