Ashi Sachdeva
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कब किसी का दिया हुआ गम मेरी आँख से टपके आँसू बन के कब मुझे आगे है बढ़ना अतीत की लाश से गुज़र के कैसे दूँ तुमको सहारा ये बात सोचती हूँ जब खुद ढो रहीं ज़िन्दगी का बोझ अपने घुटनों पे चल के

हर पल डर के साये में काट रहे जिंदगी ,मानो जीना कोई सज़ा है झिझकते है खुल के खुशियाँ मनाने से,ऐसे जीने में भला आता क्या मज़ा है खुद पर कर यकीं कर बढ़ता जा आगे,तेरा हौसला ही अब तक तेरे जीतने की वजह है करता जा करम अपना होके बिंदास ओ बंदे!आगे होगा वही जो उस ऊपरवाले की रज़ा है……………. आशी सचदेवा


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