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राह भी ना जानें...
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राह भी ना...
“
राह भी ना जानें क्यों मेरी बार बार बस सिर्फ़ तुम पर, ही आके रूक सी जातें जब तुम मेरे बन ही नहीं सकते। संभल जाता हूं जब बात आती है तुम्हें भूलने की पर, भूला नहीं पाता हूं आख़िर क्यों हुआ ऐसे हँसते हँसते।
”
By
Bhavesh Parmar
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