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प्यार की...

प्यार की भाषा कोई समझता नहीं गिर रहा इंसानियत का स्तर अपनों को अपनों से दूर करता जा रहा है, नफ़रत का ये ज़हर गरीबों को कुचला जाता, पग पग पे नारी का सम्मान हनन होता इंसानियत और मानवता को भुलाकर इंसान तू जा रहा है किधर। मिली साहा

By मिली साहा
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