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हाथो पर...

हाथो पर मेरे हाथ रखा उसने मालूम हुआ। अनकहीँ बातों को किस तरह सुना जाता हैं। एक अजीब सी बस्ती मे ठिकाना हैँ मेरा, जहाँ लोग मिलते कम और झाँकते ज्यादा हैं। उसने देखा नहीं अपनी हथेली पर क़भी, जिसमें हल्की सी लकीर हार्दिक नाम की भी हैं।

By Hardik Mahajan Hardik
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