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दे चाहें ठोकर...
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दे चाहें...
“
दे चाहें ठोकर लाख ज़माना, पत्थरों को उनके नसीब का मिल ही जाता हैं, कौन कहता है बोझ होता है कोई किसी पर, मौसम बदलते ही शाखों में फूल खिल ही जाता है। ।
”
By
Kavita Panot
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rakesh choudhary
jayesh panot
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