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ढलती हुई शामें...
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ढलती हुई...
“
ढलती हुई शामें भी मुस्कुराती है फिर भी ना जाने क्यों रातों का इंतजार रहता है....! बाते होती है सभी से मगर फिर भी ना जाने क्यों बस सिर्फ एक का इंतजार रहता है....! Karan Bansiboreliya Kb shayar 2.0 From Ujjain MP
”
By
Karan Bansiboreliya
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romantic poetry
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karan bansiboreliya
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