"कुछ मर गया था मुझमे
असे उकड़ने की कोशिश ना करना ,
चकनेचूर हुए शीशे को जोड़
आइना बनाने का ख़्वाब बेकार सा हैं |"
"अपने ख्वाबों को हमने कुछ यूही गिर जाने दिया
कि पतझर के बाद आता है मौसम मस्त बहारों का
खिलखिलातें हैं फूल बागों में और चहचाहतें हैं
पंछी नभ नवकिरणों में....."