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AJAY AMITABH SUMAN
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अजय अमिताभ सुमन: Advocate, High Court of Delhi Mob: 9990389539 E-Mail: ajayamitabh7@gmail.com Listen My Poem at https://www.youtube.com/channel/UCCXmBOy1CTtufEuEMMm6ogQ?view_as=subscriber दिल्ली हाई कोर्ट में पिछले एक दशक से ज्यादा समय से बौद्धिक संपदा विषयक क्षेत्र में वकालत जारी। अनगिनत... Read more

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Submitted on 28 Mar, 2021 at 02:11 AM

न वक्त का मारा हुआ, न तख़्त उतारा हुआ, बड़ी मुश्किल है उठना , एतबार का हारा हुआ।

Submitted on 01 Dec, 2020 at 16:01 PM

स्वभाव जो संसार भाव पर चलता, सच का उसमें वास कहाँ? और स्वभाव पे जो फलता है , मिथ्यापन एहसास कहाँ? अजय अमिताभ सुमन

Submitted on 30 Nov, 2020 at 07:32 AM

गर निज कर्म तुम्हारा तुझसे,धर्म क्षरण की माँग रखे। आ आकर अधर्म भ्रमित कर,निज धर्म का स्वांग रचे। तुम ऐसे निजधर्म का बेशक,निः संकोच परित्याग करो। वो कर्तव्य ना श्रेयकर तेरा,ना असत्य की आग रचो।

Submitted on 26 Nov, 2020 at 15:53 PM

दंभ दर्प अभिमान पिट गया, निज तेरा का बांध मिट गया। जब जब खुद को पढ़ना चाहा, इन हाथों से राम लिख गया।

Submitted on 24 Nov, 2020 at 14:31 PM

करम पे प्रभु तेरे इतना तो यकीं है, कि सर पे छत तेरा पैरों पे जमीं है।

Submitted on 21 Nov, 2020 at 02:58 AM

अज्ञान का ज्ञान मय हो जाना, मोक्ष है मोह का क्षय हो जाना। अजय अमिताभ सुमन

Submitted on 19 Nov, 2020 at 02:35 AM

सत्य भाष पर जब भी मानव ,देता अतुलित जीरो, समझो मिथ्या हुई है हावी , और सत्य कमजोर।

Submitted on 15 Nov, 2020 at 06:07 AM

जीवन प्रणाघातो से लड़कर, संघातों से फिर बच बच कर। दुःख दानव पीड़ा को सह कर, शक्ति पुरुष छाया रच रच कर। विष पीते खुद पीड़ा हर कर, पिता मेरे बरगद बन बन कर।

Submitted on 14 Nov, 2020 at 05:07 AM

आना, खड़े हो जाना और चुपचाप चले जाना, कहाँ से सीखी चुपचाप हर बात कहे जाना।


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