Atul Sharma
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Mahadev ki Jay ho

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कुछ लोग घर की खुशियों के लिए, रोज स्वयं की खुशियाँ बाज़ार में गिरवी रख आते है। अतुल शर्मा टुकराल

हमेशा ठण्डा टिफिन खाने वाले लोग, गरम खाना,खाने की जिद नही करते है।

सुनो सच के मसीहाओं आज जो ये तुमने सच की ढ़ाल पहन रखी है ना। इसे ही तुमने बहूत पहले अपनी तलवारें बना रखी थी।

वैसे आपका ख़ामोश रहकर, दिल मे बहूत कुछ रखकर, चेहरे पर कुछ भी नही झलकने देना भी, तुम्हारी सबसे बड़ी कला है।

तुम्हारी चतुराइयों के बाज़ार में हम इस तरह नीलाम हुए हैं,साहब। की हम बिकना भी चाहे तो बिना बोली लगाए ही बिक जाते है।

तुम्हारी चालाकी ने तो हद कर दी साहब। हम संभल पाते तब तक आप बहूत आगे निकल गए थे।

कुछ राजशाही तरीके होते है सभी के, अपने - अपने, अपनी ज़िन्दगी जीने के। लेकिन घर की जिम्मेदारीयां और व्यक्ति की मजबुरियाँ सब पर इन सब पर पानी फेर देते है।

एक अलग सी ही मुलाकात करनी थी उनसे। पता नही था वे इस तरह बिना बोले बहूत दूर चले जाएंगे।

में स्वयं भी,स्वयं से नाराज रहता हुँ आजकल, पता ही नही चल पा रहा हैं, क्या होगा आगे चलकर।


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