Parul Manchanda
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“चलता जा राही तेरा मंजर अभी आता ही होगा।” कुछ शब्द हमारे जीवन के अंतःकरण में रंग घोल देते है। ऐसे ही चंद शब्द है ये.. जीवन के उतार चढ़ाव में मुझे लिखने की प्रेरणा देते रहे है! कविताएँ सिर्फ़ जुमला नहीं होती शब्दों का … ये भावो का वो स्रोत होती है जिसे कलम में पिरोने की कोशिश की जाती है। इसी आशा... Read more

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लेखनी से मेरा अक्स पढ़ना चाहते है। वो हर्फ़ से मेरा ज़र्फ़ गढ़ना चाहते है। मुमकिन नहीं शब्दों में ढूँढना मेरा वजूद वो अँजुरी में दरिया समेटना चाहते है।

वो हर्फ़ से मेरा ज़र्फ़ गढ़ना चाहते है। लेखनी से मेरा ज़र्फ़ पढ़ना चाहते है। मुमकिन नहीं शब्दों में ढूँढना वजूद अँजुरी में दरिया समेटना चाहते है।

ज़िद पर अड़ा है, सच को मानता ही नहीं। या सबकुछ ही चाहिए उसे या कुछ भी नहीं।

बहुत देर लग जाती है आने में, बहुत दूर तलक जाते है जब… सुबह के भूले शाम तक आने में, आ जाये जो रस्ता भूले है अब…

क्या लिखा नसीब क्या अफ़साने में, सच बताना ग़र बोले इस बार तब… दिल राग में, मंज़िल सुर सजाने में, भय, ख़ुशी, मौन एक साथ है सब…

क़िस्मत का लिखा अपनाना बाक़ी है। वफ़ा से रूह को निभाना बाक़ी है। क्या लेना चतुर-सयाना बनके, भोले के दरबार में केवल भोला बाक़ी है।

झूठी दुनिया में थोड़े से हम सच्चे ग़र पागल तो हम पागल ही अच्छे

एकादशी का दिन है, व्रत है मेरा… कड़ाह प्रसाद हाथ में कोई रखता है भला जिस गाँव जाना नहीं, रस्ते की खबर आग में पैर इस तरह कोई धरता है भला कुछ तो कमी है या कोई ख़ता हुई हमसे वरना प्यार करके… रोज़ कोई मरता है भला

दिल धड़क-सा रह गया इज़हार में, जवाब माँगते तो मिलता इंतज़ार में, बख्श दे ख़ुदा मेरे हिस्से की प्रीत… वरना ख़त्म कर दे खेल एकसार में!


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