बेचैनियाँ और भावों का तूफान जब मन की कैद से निकलने को व्याकुल हो उठता है तो सभी बंधनों को तोड़ आप से आप मन शब्दों का सहारा ढूँढ ही लेता है...हर रोज कुछ पल एकांत में अपने साथ प्रकृति के सानिध्य में बिताना मानों मेरे रिचार्ज कूपन हैं ...और मन की ख़ामोशी कलम को हाथ में पकड़ मुखर हो बोलने लगती है ...
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