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Mamta Singh Devaa
Literary Brigadier
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" लेखन से अपने मन को संतुष्ट और लेखनी को मजबूत करती हूँ " मैं भारत से Pottery & Ceramic में Masters 1993 ( Faculty of Visual Arts , BHU ) करने वाली भारत की पहली महिला हूँ , कविता , कहानी , लघुकथा ,संस्मरण लेख , हाइकु , कहमुकरी और कोट लिखती हूँ , नैरेटर भी हूॅं ।

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चाॅंद तुम.... अपना वादा पूरा करोगे अपनी शीतलता से सूरज को शीतल करोगे । स्वरचित एवं मौलिक ( ममता सिंह देवा )

सब्र रखीये सुना है  इसका फल मीठा होता है न रखने पर ये बड़ा ज़हरीला होता है । ( ममता सिंह देवा )

अरे जनाब ! ये हिन्द की हिन्दी है जो हिन्द के दिल में सदियों से है सजती बन कर माथे की तिलक/बिंदी है । ( ममता सिंह देवा )

कभी तो किसी की पीठ थपथपाना सीखो क्यों हर बात पर कमी निकालते हो कभी तो किसी का हुनर दिल से सराहना सीखो । ( ममता सिंह देवा )

एकदम नही होने से तो थोड़ा होना ज्यादा अच्छा है पूरा खोने से तो थोड़ा मिलना ज्यादा सच्चा है । ( ममता सिंह देवा )

उड़ना है पंख पसार अपने हौसलों के ज़रिए नही मानना है हार । ( ममता सिंह देवा )

बिना किसी आवाज़ के चीते की तरह हौले से मंजिल पास ही तो है दबोच लो हौसले से । ( ममता सिंह देवा )

कुछ रिश्तों के नाम तो कुछ बेनाम ही सही नाम से भी क्या रिश्त बनते हैं कभी । ( ममता सिंह देवा )

हर उम्र का अपना एक हिसाब होता है कुछ कम तो कुछ बेहिसाब होता है । ( ममता सिंह देवा )


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